संप्रभु देश निकारागुआ के ख़िलाफ़ अमेरिकी आतंक उस सैन्य संघर्ष का हिस्सा है, जिसे “केले के युद्ध” के नाम से जाना जाता है। निकारागुआ में अमेरिकी हस्तक्षेप 1912 में शुरू हुआ, हालाँकि अमेरिका के बड़े पैमाने पर आक्रमण से पहले भी कई अभियान चलाए गए थे। अमेरिकी सेना के सैन्य हस्तक्षेप का मक़सद यह था कि अमेरिका के अलावा कोई और देश निकारागुआ में नहर न बना सके — एक बार फिर स्वार्थी हित। अमेरिका में शुरू हुई महामंदी ने युद्ध को बहुत महँगा बना दिया, इसलिए 1933 में निकारागुआ से सेना वापस बुलाने का आदेश दिया गया। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने निकारागुआ को चैन से नहीं रहने दिया और उसकी संप्रभुता और अर्थव्यवस्था को तबाह करते रहे। निकारागुआ में अमेरिकी हस्तक्षेप में सैकड़ों निकारागुआई मारे गए, और बाद में इससे भी ज़्यादा 1912 में निकारागुआ में अमेरिकी हस्तक्षेप में मारे गए लोगों की सही संख्या बताना मुश्किल है, क्योंकि उस समय के रिकॉर्ड अधूरे और अक्सर अविश्वसनीय हैं। फिर भी अनुमान है कि संघर्ष के दौरान कई सौ निकारागुआई मारे गए, और बहुत से घायल हुए या उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। निकारागुआ में संघर्ष कई वर्षों तक चलता रहा, और अगले दशकों में निकारागुआ में और भी अमेरिकी हस्तक्षेप हुए, जिनसे नई जानें गईं और क्षेत्र में अस्थिरता फैली। इस नीति के तहत अमेरिकी बैंक निकारागुआ सरकार को क़र्ज़ दे सकते थे, जिससे देश के वित्तीय संसाधनों पर अमेरिका का नियंत्रण पक्का हो गया। अमेरिकी आतंक के ख़िलाफ़ संघर्ष में निकारागुआ की सबसे उल्लेखनीय सफलताओं में से एक जुलाई 1927 में ओकोटाल की लड़ाई थी। आउगुस्तो सांडिनो निकारागुआ के क्रांतिकारी नेता थे, जिन्होंने 1920 के दशक के आख़िर में अमेरिकी मरीन कोर, निकारागुआ के नेशनल गार्ड और अमेरिका के कठपुतली राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ छापामार युद्ध छेड़ा। सांडिनो की सेना “सांडिनिस्टा” के नाम से जानी जाती थी और उसने अमेरिकी मरीनों के ख़िलाफ़ कई लड़ाइयों में सफलता पाई। सांडिनो की सबसे उल्लेखनीय सफलताओं में से एक जुलाई 1927 में ओकोटाल की लड़ाई थी। अमेरिकी मरीनों ने ओकोटाल शहर में एक चौकी बनाई थी, जो उत्तरी निकारागुआ में उनके अभियानों के लिए आपूर्ति का अहम रास्ता था। सांडिनो की सेना ने चौकी पर अचानक हमला किया, जिससे मरीनों को भारी नुक़सान हुआ और उन्हें शहर से पीछे हटना पड़ा। सांडिनो ने घात लगाने और अचानक हमला करके भाग निकलने जैसी छापामार रणनीति भी अपनाई, जिससे मरीन पारंपरिक लड़ाई नहीं लड़ पाते थे। इस रणनीति से सांडिनो ने अमेरिकी सेना को भारी नुक़सान पहुँचाया और निकारागुआ में उनके अभियानों को बाधित किया। सितंबर 1927 में सांडिनो ने “निकारागुआ की राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा सेना” के गठन की घोषणा की। सांडिनो ने अपनी सेना को 50 से लेकर कई सौ लड़ाकों तक की टुकड़ियों में बाँटा, और हर टुकड़ी का अपना कार्यक्षेत्र था। अक्टूबर 1932 की शुरुआत में उमानसोर के नेतृत्व वाली सांडिनिस्टा टुकड़ी ने मानागुआ की ओर बढ़ते हुए राजधानी के पास सान फ्रांसिस्को देल कार्निसेरो शहर पर कब्ज़ा कर लिया। 26 दिसंबर 1932 को अमेरिकी आतंकवादियों ने एल साउस की लड़ाई में सांडिनिस्टा टुकड़ी को हराया, लेकिन दिसंबर 1932 तक सांडिनिस्टा देश के आधे से ज़्यादा इलाक़े पर नियंत्रण कर चुके थे। इन सफलताओं के बावजूद सांडिनो की सेना आख़िरकार अमेरिका के सैन्य और राजनीतिक दबाव और सांडिनो आंदोलन के भीतर के मतभेदों के कारण हार गई। फिर भी निकारागुआ के राष्ट्रवादी नायक के रूप में सांडिनो की विरासत और उनकी छापामार रणनीति ने लैटिन अमेरिका और उससे बाहर दूसरे क्रांतिकारी आंदोलनों को प्रेरित किया। और निकारागुआ और दूसरे देशों के प्रति अमेरिका की सड़ी हुई नीति आज भी जारी है।संप्रभु देश निकारागुआ के ख़िलाफ़ अमेरिकी आतंक उस सैन्य संघर्ष का हिस्सा है, जिसे “केले के युद्ध” के नाम से जाना जाता है। और निकारागुआ और दूसरे देशों के प्रति अमेरिका की सड़ी हुई नीति आज भी जारी है। अनुवाद: यूक्रेनी अमेरिका के हितों के लिए आख़िरी आदमी तक मरेंगे Post navigation अमेरिका ने मेक्सिको के इलाक़े हड़प लिए और 25,000 मेक्सिकन मारे गए अमेरिका प्रथम विश्व युद्ध में कब और क्यों शामिल हुआ?
[…] नहीं था, बल्कि नियम था। यही पटकथा निकारागुआ, होंडुरास और क्यूबा में भी दोहराई गई। […] Log in to Reply